Friday, 7 March 2014

मेरा तीन दिन का मायका!!

साल २००५ की बात है। कभी भी उठकर मुंबईसे नागपुर जाना पड़ता थामानो एक आदत सी बन गयी थी।  कभी आरक्षण तो कभी बिना आरक्षण मैं जैसे तैसे निकल पड़ती थी।  मानो जैसे मेरे जाने से ही समस्या का निवारण होना था। पर क्या करें जाना ही पड़ता। 

एक बार ऐन जुलाई महीने में, मैं विदर्भ एक्सप्रेस से मुम्बई आने निकली। मुझे ऊपर का बर्थ मिला था। सुबह ६ बजे मुम्बई में दादर पोहोंचने के हिसाब से मैं आरामसे सोयी।  मुझे ट्रेन का सफ़र बहुत पसंद है, वो भी अकेले। बस सो जाओ, और फिरफिर से सो जाओ।  विवेकानंद केंद्र में रहतेट्रेन का सफ़र यह  थकान निकालने का और आराम पाने का एक तरीका था। पता नहीं लोग दुख भुलाने के लिए शराब, सिगरेट का सहारा क्यूँ लेते हैं ! मुझे तो लगता है कि कुछ भी भूलना हो, मन से मिटाना हो तो बस सो जाओ और भूल जाओ।  सुबह उठाते ही एक नया जनम, एक नया जीवन शुरु।

जब आँख खुली तो देखा के सवेरे के ३ बज  रहे हैं और नाशिक स्टेशन आया है। सोचा, बस अब और ३ घंटे और फिर मैं मुम्बई में रहूंगी। फिर से सो गयी ताके सोने का समय ज़रा भी बर्बाद ना हो जाए।  जब दुबारा उठी तो देखा के ६ तो बज गए हैं पर ट्रेन तो इगतपुरी में ही है। बाहर धुआंधार बारिश हो रही थी और आगे कसारा स्टेशन के पहले रेलवे ट्रैक पर इलेक्ट्रिक पोल गिर जाने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। मैं लेते लेते निचे बैठे लोगों कि बातें सुन रही थी और मेरा बड़ा मनोरंजन हो रहा था।

मेरे बोगी में ठाणे के रहनेवाले बुजुर्गों का गुट था। उस दिन संकट चौथ थी जिस दिन काफी मराठी लोग उपवास रखते हैं। उन सबका भी उपवास था और वें घर जाकर क्या खाएं इस बारे में चर्चा कर रहे थे।  साबूदाना खिचड़ी, आलू कि सब्जी, मूंगफली के लड्डू इत्यादि व्यंजनो के नाम लेकर खुश हो रहे थे। 

पर पता चला के ट्रेन कब छूटेगी पता नहीं।  शायद उल्टा वापस भुसावल जाकर दौंड, पुणे होकर कल शाम तक मुम्बई पोहोंचेंगी। सारे फ़ोन बंद थे; मोबाइल भी इतने प्रचलित नहीं थे।  मेरे पास रिलायंस का फ़ोन था जिसमें नेटवर्क नहीं था। मैं चुपचाप अपने ही विचारों में मगन लेटी थी। जो होगा देखा जायेगा और कर भी क्या सकते हैं?

कुछ ११ बजे एक महिला ने मुझसे कहा, "चलो, कहीं फ़ोन ढूंढ़ते हैं। " पता चला के वें शेगाव से बैठी थी और मुम्बई में उनका ससुराल था।  बहुत ढूंढा पर कोई भी फ़ोन नहीं चल रहा था।  हम यहाँ वहाँ ढून्ढ ढांड के बस अपने बोगी तक पुहंचे ही थे के एक लम्बा चौड़ा आदमी उस महिला को ढूंढ़ते वहाँ पोहोंच गया। शेगाव से उस महिला के भाई ने इन्हे फ़ोन किया था और अपनी बहन को मदद करने को कहा।

उन्होंने उस महिला का सामान लिया और मुझसे कहा, "चलिए, आपका सामान कहाँ है?"

"मेरा सामान? पर मैं इनके साथ नहीं हूँ !"

"नहीं, नहीं, आप भी चलिए। आप यहाँ कहाँ रुकोगी?"

उस भले आदमी ने मेरी एक ना सुनी और हम दोनों का सामान लेकर वे हमें अपने घर ले गए। उनका नाम था श्री हनुमंत चोरडिया।  घर पर उनकी पत्नी, बेटी और चांदवड से आयी हुई उनकी बहन थी।  उन्होंने हमें पहले चाय पिलायी और नहाने के लिए गरम पानी दिया। सच कहती  हूँ उस धुंमधार बारिश में गरम  चाय और  पानी का स्वाद ओ स्पर्श मैं आजतक नहीं भूली।

नहाने के बाद नाश्ता जब सामने आया तो मेरे आँखों में आंसू थे। मैं समझ नहीं पा रही थी के मुझे ख़ुशी हो रही है फिर भी ये आंसू क्यूँ ? दरअसल जिन व्यंजनो के बारे में मेरे हमसफ़र बुजुर्ग बात कर रहे थे, वे सारे पदार्थ मेरे सामने थाली में थे।  पूछने पर जाना के यह परिवार जैन मारवाड़ी होते हुए भी महाराष्ट्र में रह्कर हमारे ही जैसे संकट चौथ का व्रत करते है। इसलिए साबूदाने कि खिचड़ी, आलू के पापड, लड्डू और भी बहुत कुछ मुझे खाने को मिला।

श्री श्री माँ सारदादेवी ने श्री रामकृष्ण देव से प्रार्थना की थी, के जो भी उनके नाम से उनका कार्य करने हेतु बाहर निकलेगा वह कभी भी भूखा न रहे और यह वचन  प्रमाणित होते हुए मैं देख रही थी।

उस घर में मैं तीन दिन रुकीलाड प्यारसे उस परिवार ने मेरा पूरा ख्याल रखा। कहीं से मेरे पति को नागपुर में और मुम्बई में मेरी माँ को मेरी खुशहाली बता दी थी। शाम होने पर सारे घरवाले लौट आये, कोई स्कूल से, कोई कॉलेज से तो बड़ा बेटा अपने दवाखानेसे।  उनके घरमें कुल मिलाकर तक़रीबन ३५ लोग थे।  सारे ७.३० बजे प्रार्थना के लिए इक्कठा हुए।  मुझे भी एक किताब दी गयी और वह मेरी जिंदगी कि पहली जैन धर्म कि प्रार्थना; ठीक से सुनी हुई और ठीक से गायी हुई।

तीसरे दिन नाशिक से निकल चुकी पहली बस में हनुमंत भेजी ने मुझे बिठाया।  रात को एक बजे मैं बोरीवली पोहोंची, आखरी ट्रेन में बैठकर मैं बांद्रा अपने घर  पोहोंची। आगे काफी दिनों तक उस परिवार से संपर्क रहा पर फिर नियति  के दुबारा जा ना पायी। 

यह था मेरा तीन दिन का मायका।  घर से दूर मेरा एक और घर !!

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