Tuesday, 6 May 2014

जहाँ खेत में हल के नीचे, खेला करती सीता है...

यह १९८६ कि बात है।  मैं तब अरुणाचल प्रदेश के ताफ्रागाम स्कूल में थी।  जब कन्याकुमारी में ट्रेनिंग चल रहा था, तब अरुणाचल कि एक फ़िल्म हम बार बार देखते थे।  उसे देखकर मेरा मन अरुणाचल कि ओर खिंचा जाता और वाकई मेरे प्यारे अरुणाचल के ताफ्रागाम में ही मेरा पोस्टिंग हुआ। दो साल मजेसे कटे और एक दिन विवेकानंद केंद्र के तबके जनरल सेक्रेटरी श्री बालकृष्णननजी स्कूल में आये। रातको उन्होने बहुत सहजता से कहा, 'श्रद्धा, कल तुम्हे  अलोंग के लिए निकलना है।

जैसे तैसे सामान भरा, सारे होस्टल् में जाकर बच्चियोंसे मिली और अपने भावनाओंको समझनेसे पहले ही मैं स्कूल से निकल थी। मेरी सबसे खास सहेली तुलसी, पूनम, प्रिय दीदियां अपर्णा और मंदा और मेरे हॉस्टल कि मेरी बेटियां प्रतिमा मानताव, तिमिता, लोली, किमी, योयांग ऐसे कितने सारे नाम…. इन सबको छोड़कर जाना आसान नहीं था। शायद यह जानते हुआ श्री बालकृष्णनजी ने मुझे  समय नहीं दिया।  किसी भी मनुष्य या चीज से लगाव कितना कठिन होता है, है न ?

मुझे बस इतना याद है के मैं बेइंतेहा रोये जा रही थी। वैसे भी मैं तब बहुत रोतीछोटी छोटी बात पर भी आंसू बहाना आदत थी। मानो ब्रह्मपुत्र नदी आँखों में लिए घूमती थी।  अब बड़ी मुश्किल से आंसू निकलते हैं।

मेरी सहेली तुलसी ने कहा, 'पंछी को आज़ाद छोड़ दो, अगर लौट आये तो वह तुम्हारा अपना या तो फिर तुम्हारा कभी नहीं था।लौटने कि बात दूर रही, मैं तो कभी ताफ्रागाम या अलोंग से निकली ही नहीं…… मैं कहीं भी रहूँ पर अब तक मन वहीँ अरुणाचल कि आँचल में अटका पड़ा है।

अलोंग की यादें पहले उभर कर आ रही है क्यों कि वहां शुरु में सिर्फ़ आ. रेखा दीदी और मै हि थे तकरिबन ६ महीनो तक।  बादमें गीतादि आई और जब मै निकली तब शिप्रा दीदी भी थी।

जब बच्चियां नयी नयी आयीं थी तब हम उनसे हिंदी में बात करते, और जब वे हिंदी सिख जाति तब हम सिर्फ़ अन्ग्रेजी में बात करते ताके वे इँग्लिश सिख जाये। मैं और रेखा दीदी उन्हें बहुत गाने सीखाते।  तब उनको 'चन्दन है इस देश कि माटी , तपोभूमि हर ग्राम है। हर बाल देवी की प्रतिमा , बच्चा बच्चा राम है।' यह गीत सिखा रहे थे। उस गीत में एक पंक्ति है -  जहाँ खेत में हल के नीचे, खेला करती सीता है।

यह पंक्ति सीखते वख्त मैने उन्हें सीताजी के पृथ्वी से जनम लेने की कथा भी सुनायीं थी। एक दिन जब मैं उनकी कक्षा में पढ़ा रही थी तब अचानक जोरदार भूकम्प से स्कुल कि इमारत हिल उठी।  भूकम्प से हम सभी डर गये और मैने उनको क्लास से जल्दी जल्दी बाहर निकाला। बाद में जब सब शांत हुआ तब हम फिरसे क्लासरूम मैं चले आये। 

अरुणाचल में बच्चों को जितनी ज्यादा जानकारी दे सकते उतना उस समय अच्छा रहता क्युँकी तब टेलीविज़न इतना आसानी से उपलब्ध नहीं था और उपरसे लोड शेडिंग भी रहती थी। इसलिए मैं उन्हें मोहेन जोदड़ो और हरप्पा कि संस्कृति के बारे में कहने लगी। देखा के लडकियां बिलकुल भी घबड़ाई नहि थी।

मैंने कहा, देखो, भूकम्प होने से ऐसे बड़े बड़े साम्राज्य भी जमीं मैं गड जाते हैँ। अगर आज भी जमीं फटती तो … ?मुझे लगा के सब डर जाएँगी और फिर मैं उन्हें कुछ समझाउंगी , पर.

जवाब आया - "दीदी, अगर जमीन फट जायेगी तो हम सीता को देखेँगे। " यह कहकर वें सब तालियां पीटने लगी।

मैं आजतक और अबतक उस घटना से और उस जवाब से बाहर निकल नहीं पायी हूँ।


मुझे यह सब आपसे कहना और बांटना हि चाहिए।  है ना ? कैसे लगी मेरी मंतरी हुई यादों कि शीशी

Friday, 7 March 2014

मेरा तीन दिन का मायका!!

साल २००५ की बात है। कभी भी उठकर मुंबईसे नागपुर जाना पड़ता थामानो एक आदत सी बन गयी थी।  कभी आरक्षण तो कभी बिना आरक्षण मैं जैसे तैसे निकल पड़ती थी।  मानो जैसे मेरे जाने से ही समस्या का निवारण होना था। पर क्या करें जाना ही पड़ता। 

एक बार ऐन जुलाई महीने में, मैं विदर्भ एक्सप्रेस से मुम्बई आने निकली। मुझे ऊपर का बर्थ मिला था। सुबह ६ बजे मुम्बई में दादर पोहोंचने के हिसाब से मैं आरामसे सोयी।  मुझे ट्रेन का सफ़र बहुत पसंद है, वो भी अकेले। बस सो जाओ, और फिरफिर से सो जाओ।  विवेकानंद केंद्र में रहतेट्रेन का सफ़र यह  थकान निकालने का और आराम पाने का एक तरीका था। पता नहीं लोग दुख भुलाने के लिए शराब, सिगरेट का सहारा क्यूँ लेते हैं ! मुझे तो लगता है कि कुछ भी भूलना हो, मन से मिटाना हो तो बस सो जाओ और भूल जाओ।  सुबह उठाते ही एक नया जनम, एक नया जीवन शुरु।

जब आँख खुली तो देखा के सवेरे के ३ बज  रहे हैं और नाशिक स्टेशन आया है। सोचा, बस अब और ३ घंटे और फिर मैं मुम्बई में रहूंगी। फिर से सो गयी ताके सोने का समय ज़रा भी बर्बाद ना हो जाए।  जब दुबारा उठी तो देखा के ६ तो बज गए हैं पर ट्रेन तो इगतपुरी में ही है। बाहर धुआंधार बारिश हो रही थी और आगे कसारा स्टेशन के पहले रेलवे ट्रैक पर इलेक्ट्रिक पोल गिर जाने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। मैं लेते लेते निचे बैठे लोगों कि बातें सुन रही थी और मेरा बड़ा मनोरंजन हो रहा था।

मेरे बोगी में ठाणे के रहनेवाले बुजुर्गों का गुट था। उस दिन संकट चौथ थी जिस दिन काफी मराठी लोग उपवास रखते हैं। उन सबका भी उपवास था और वें घर जाकर क्या खाएं इस बारे में चर्चा कर रहे थे।  साबूदाना खिचड़ी, आलू कि सब्जी, मूंगफली के लड्डू इत्यादि व्यंजनो के नाम लेकर खुश हो रहे थे। 

पर पता चला के ट्रेन कब छूटेगी पता नहीं।  शायद उल्टा वापस भुसावल जाकर दौंड, पुणे होकर कल शाम तक मुम्बई पोहोंचेंगी। सारे फ़ोन बंद थे; मोबाइल भी इतने प्रचलित नहीं थे।  मेरे पास रिलायंस का फ़ोन था जिसमें नेटवर्क नहीं था। मैं चुपचाप अपने ही विचारों में मगन लेटी थी। जो होगा देखा जायेगा और कर भी क्या सकते हैं?

कुछ ११ बजे एक महिला ने मुझसे कहा, "चलो, कहीं फ़ोन ढूंढ़ते हैं। " पता चला के वें शेगाव से बैठी थी और मुम्बई में उनका ससुराल था।  बहुत ढूंढा पर कोई भी फ़ोन नहीं चल रहा था।  हम यहाँ वहाँ ढून्ढ ढांड के बस अपने बोगी तक पुहंचे ही थे के एक लम्बा चौड़ा आदमी उस महिला को ढूंढ़ते वहाँ पोहोंच गया। शेगाव से उस महिला के भाई ने इन्हे फ़ोन किया था और अपनी बहन को मदद करने को कहा।

उन्होंने उस महिला का सामान लिया और मुझसे कहा, "चलिए, आपका सामान कहाँ है?"

"मेरा सामान? पर मैं इनके साथ नहीं हूँ !"

"नहीं, नहीं, आप भी चलिए। आप यहाँ कहाँ रुकोगी?"

उस भले आदमी ने मेरी एक ना सुनी और हम दोनों का सामान लेकर वे हमें अपने घर ले गए। उनका नाम था श्री हनुमंत चोरडिया।  घर पर उनकी पत्नी, बेटी और चांदवड से आयी हुई उनकी बहन थी।  उन्होंने हमें पहले चाय पिलायी और नहाने के लिए गरम पानी दिया। सच कहती  हूँ उस धुंमधार बारिश में गरम  चाय और  पानी का स्वाद ओ स्पर्श मैं आजतक नहीं भूली।

नहाने के बाद नाश्ता जब सामने आया तो मेरे आँखों में आंसू थे। मैं समझ नहीं पा रही थी के मुझे ख़ुशी हो रही है फिर भी ये आंसू क्यूँ ? दरअसल जिन व्यंजनो के बारे में मेरे हमसफ़र बुजुर्ग बात कर रहे थे, वे सारे पदार्थ मेरे सामने थाली में थे।  पूछने पर जाना के यह परिवार जैन मारवाड़ी होते हुए भी महाराष्ट्र में रह्कर हमारे ही जैसे संकट चौथ का व्रत करते है। इसलिए साबूदाने कि खिचड़ी, आलू के पापड, लड्डू और भी बहुत कुछ मुझे खाने को मिला।

श्री श्री माँ सारदादेवी ने श्री रामकृष्ण देव से प्रार्थना की थी, के जो भी उनके नाम से उनका कार्य करने हेतु बाहर निकलेगा वह कभी भी भूखा न रहे और यह वचन  प्रमाणित होते हुए मैं देख रही थी।

उस घर में मैं तीन दिन रुकीलाड प्यारसे उस परिवार ने मेरा पूरा ख्याल रखा। कहीं से मेरे पति को नागपुर में और मुम्बई में मेरी माँ को मेरी खुशहाली बता दी थी। शाम होने पर सारे घरवाले लौट आये, कोई स्कूल से, कोई कॉलेज से तो बड़ा बेटा अपने दवाखानेसे।  उनके घरमें कुल मिलाकर तक़रीबन ३५ लोग थे।  सारे ७.३० बजे प्रार्थना के लिए इक्कठा हुए।  मुझे भी एक किताब दी गयी और वह मेरी जिंदगी कि पहली जैन धर्म कि प्रार्थना; ठीक से सुनी हुई और ठीक से गायी हुई।

तीसरे दिन नाशिक से निकल चुकी पहली बस में हनुमंत भेजी ने मुझे बिठाया।  रात को एक बजे मैं बोरीवली पोहोंची, आखरी ट्रेन में बैठकर मैं बांद्रा अपने घर  पोहोंची। आगे काफी दिनों तक उस परिवार से संपर्क रहा पर फिर नियति  के दुबारा जा ना पायी। 

यह था मेरा तीन दिन का मायका।  घर से दूर मेरा एक और घर !!

Tuesday, 25 February 2014

सर्वेश कि कहानी का उत्तरार्ध: मैं तो चुप रहूंगी!


सर्वेश कि बात वहाँ नहीं खत्म हुई जहां व्यक्तिमत्व विकास शिविर समाप्त हुआ।  शिविर के पश्चात दो चार दिन के बाद मुझे उसकी बहुत याद आने लगी। वैसे भी हम शिविरार्थियों को मिलने जाते ही थे लेकिन इस बार मन जैसे उसको देखने के लिए व्याकुल था। मैंने प्रवीण से कहा चलो उसके घर जाते हैं। उसका घर पेरुगेट में था और वह 'वाडा' माने हवेली जैसे घर में रहता था। पुणे में जो टिपिकल पुराने घर थे उसका 'दिंडी' दरवाजा छोटा होता है और उसी दरवाजे से अंदर जाते समय सर्वेश ने साइकल से हाथ छोड़ दिए थे।

जब मैं और प्रवीण उसके पते पर पहुंचे तो देखा के जैसा उसने वर्णन किया था वैसा ही घर था।  दरवाजा बहुत ही छोटा था जिसे देखकर ही मेरी आँखें भर आयी। घर में सर्वेश के माँ बाबा और बहन थे। उन्होंने हमारी बड़ी आवभगत कि और उसकी माँ सर्वेश के बारे में कहने लगी।  सर्वेश तो चुपचाप और शांत बैठा था। सर्वेश कि बहन महाविद्यालय में पढती थी और दोनों भाई बहनो की उम्र में काफी अंतर था। सर्वेश घर में सबसे छोटा था इसिलिए ज्यादा लाड़ला था  पर माँ से उसे विशेष लगाव था। इसी वजह से सर्वेश माँ के बिना एक दिन भी दूर नहीं रह पाता।

हम चाय पी रहे थे और उसकी माँ सर्वेश के गुण बता रही थी और वो आँखें  नीचे किये सुन रहा था। इतने में उसकी माँ ने कहा, "ये सर्वेश बड़ा जिद्दी भी है। आपको पता है एक बार क्या हुआ? ये साइकल चला रहा था और न जाने कैसे गिर गया। इसका कान फट गया और काफी बड़ा जख्म हुआ। डॉक्टर को घर पर बुलाना पड़ा। उन्होंने कहा के लोकल अनेस्थेशिया देकर कान का जख्म सिलना पड़ेगा।  ये इतना जिद्दी है के इसने अनेस्थेशिया लेनेसे साफ़ मना कर दिया।  ना ये घबराया और कान सिलने तक मुँह से आवाज भी नहीं निकाली।

जब उसकी माँ उस किस्से को बयान कर रही थी, सर्वेश मुझे और प्रवीण को देख रहा था। मानो नजरों से मुझे अपना वचन याद दिला रहा हो। जैसे ही माँ कि बात ख़त्म हुई, सर्वेश ने फिरसे आँखें नीचे झुकायी। सारा किस्सा सुनते वख्त मैं अंदर से कांप रही थी, अपने आंसू रोकने कि कोशिश कर रही थी।  दिल कर रहा था उठके सर्वेश को गले लगाऊं पर अपने वचन से बंधी थी ना ! चेहरे पर आश्चर्य लिए ऐसे सुन रही थी मानो पहली बार सुन रही हूँ।

अब वो बड़ा हुआ होगा....मैं परसों पुणे में थी और जान बूझकर पेरुगेट इलाके में गयी।  सारा माहौल बदल चूका है, ना जाने वो सर्वेश का वाडा कहाँ गया। जुबान पर बार बार उसका असली नाम आ रहा है। तेरी कितनी भी याद आये सर्वेश, मैं तो चुप रहूंगी!

Saturday, 15 February 2014

मुझे मुक्त कर दो अपने वचन से सर्वेश !!!

सर्वेश कि कहानी:

सोचती हूँ, ब्लॉग हिंदी में ही लिखा जाय ताके ज्यादा लोगों के साथ मेरे अनोखे अनुभव बाँट सकूँ। यह तबकी बात है जब मैं पुणे विवेकानन्द केंद्र में जीवनव्रती के तौर पर कार्य कर रही थी।  हर वर्ष वार्षिक परीक्षाओं के बाद हम छटवी से आठवी के बच्चों का 'व्यक्तिमत्व विकास शिविर' लिया करते थे।  दो बार मैंने पांचवी के बच्चों को लिया और जीवनभर के लिए हट के अनुभवों का संग्रह हुआ। 

मुझे अफ़सोस है के मैं उसका असली नाम नहीं लिख सकती।  जो मैं कहने जा रही हूँ वह उसका सभीसे छुपाया हुआ रहस्य था।  पर इतना प्यारा रहस्य के अब मैं और ज्यादा समय इसे मेरे पास नहीं रख सकती।  अप्रैल १९९१ कि बात है तब हम लोग हिंगने के कर्वे इंस्टिट्यूट में शिविर लिया करते थे। शाम के  ६ बजे तक सारे शिविरार्थी बच्चे आ चुके थे।  पांच दिन के शिविर में साठ से ज्यादा बच्चों को नहीं लेते। पहले दिन शाम सात बजे तक रिपोर्टिंग था और लगभग सारे बच्चे आ गए थे।   

तक़रीबन नौ बजे एक गोरा, प्यारा लड़का मेरे पास आया।  मैंने पहचाना यही वह पांचवी क्लास का सबसे छोटा बच्चा था। कहने लगा, "ताई, मुझे घर जाना है, मुझे माँ कि याद आ रही है।" मैंने उसके साथ एकदम बड़ों जैसे व्यव्हार शुरू किया।

"रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरते वक्त क्या तुमने नियम देखे थे? फिर तुम्हे पता होना चाहिए के अब पांच दिन तक तुम घर नहीं जा सकते?"
वह - हाँ, मैंने सब पढ़ा था पर अब नहीं रुक सकता, माँ कि याद आ रही है।
मैं - अब बहुत देर हो गयी है, अब कुछ नहीं हो सकता। (मैंने सोचा वो कल तक भूल जायेगा) पर फिर भी वो अडा रहा। 
वह- मुझे फ़ोन करना है।
मैं - नियम के अनुसार तुम फोन नहीं कर सकते।
वह - लेकिन मुझे जाना है।
मैं - ठीक है, रिक्शा में बैठो और जाओ।
वह - बहुत रात हुई है, अकेला कैसे जाऊँ? तुम छोड़ने चलो।
मैं - शिविर छोड़के मैं कहीं नहीं जा सकती। चाहो तो सुबह चले जाओ।

कुछ सोचकर वह चला गया। दूसरे दिन सुबह प्रार्थना, योगासनके बाद नाश्ते के समय वो मेरे पास आया। उस समय विवेकानंद केंद्र में हम पूर्णकालीन कार्यकर्ताओंको साड़ी पहनना अनिवार्य था। बाकी सारी लडकियां सलवार कुर्ती पहनती थी।  

"क्या मैं तुमसे कुछ पूछ सकता हूँ?"
"हाँ, पूछो!"

अगर मैं घर गया तो माँ को बहुत बूरा लगेगा।  जब भी मुझे उसकी याद आये तो क्या मैं तुम्हारे पास आकर तुम्हे छू सकता हूँ? तुम मेरे माँ जैसी साडी पहनती हो।

मैंने उसे अपने पास लिया और कहा, "हाँ, तुम बिलकुल मुझे छू सकते हो। जब भी माँ कि याद आये तो मेरे पास चले आना।"

दो तीन दिन वो दिन में चार पांच बार मेरे पास आता,  मेरा पल्लू हात में लेता, कभी पास आकर लिपट जाता और मैं मन ही मन एकदम खुश के अरे वाह, बच्चा शिविर में रुक गया।
तीसरे दिन मैं प्रवीण पायगुडे और अन्य दो कार्यकर्ताओंके साथ बैठी थी, इतने में वो आया।

"मुझे तुमसे कुछ कहना है।"

"कहो!"

औरोंकी तरफ देखकर बोला, "तुमसे अकेलिसे कुछ कहना है।"

"ये सब मेरे अपने है, इनके सामने तुम बोल सकते हो। वो किसीसे  कुछ नहीं कहेंगे।"
उसने सबकी ओर देखा और कहा, "मैं मेरी माँ से बहुत प्यार करता हूँ।"

मैंने कहा, "मैं भी मेरी माँ से बहुत प्यार करती हूँ।  हम सभी करते हैं।  पर जबसे मैं विवेकानन्द केंद्र में आयी तबसे मुझे माँ से दूर रहना पड़ता है।  क्या करूँ, मुझे भी उनकी बहुत बहुत याद आती है।"

अच्छा तो मुझे प्रोमिस करो के अब जो मैं कहूंगा वो तुम किसीसे नहीं कहोगी।"
मैंने उसका छोटासा हाथ अपने हाथ में लेकर वचन दिया, "नहीं कहूँगी बाबा, किसीसे कुछ नहीं कहूँगी।"

वो - "पर मैं आप सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ मेरी माँ से।" उसने जोर देकर कहा।
फिर वो मेरे एकदम नजदीक आया और अपना दाहिना कान मुझे दिखाने लगा।
"ये चोट देख रही हो?"

मैंने देखा उसका कान फटा है और जख्म का निशान भी है।

मैंने कुछ पूछने के पहले ही वो बोलने लगा -

पता है, एकबार माँ सब्जी काट रही थी।  और काटते काटते उसका हाथ कट गया और खून बहने लगा। ये देखते ही मैं अपनी साइकल लेकर बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद अंदर आते आते दरवाजे के बाहर ही दोनों हाथ छोड़ दिए।  और फिर मैं जोरसे अंदर गिर पड़ा और मेरा कान फट गया।  जब डॉक्टर आये तो मैंने उनसे कहा, "मुझे एनेस्थेसिआ मत दो, यूँही मेरा कान सी दो पता है, कान का जख्म सीते वख्त मैं ज़रा भी नहीं रोया, मैंने उफ़ तक नहीं किया।"
मैं अपनी माँ से इतना प्यार करता हूँ इसीलिए मैंने मुझे भी चोट पोहोंचायी।"

हम सब सुन्न होकर चुपचाप उसकी बात सुन रहे थे। दंग रह गए थे।

मैंने उसे गले लगाया और कहा,   

"सचमें सर्वेश, हम में से कोई भी तुम्हारे जितना प्यार अपनी माँ से नहीं करता।"
शिविर के पांचवे दिन वह घर जाने के लिए तैयार नहीं था। मेरे कमर से हाथ लपेटे रोये जा रहा था। उसके माँ बाबा आश्चर्य से देख रहे थे  और कहने लगे, " हमें तो लगा ये एक दिन में वापस आ जायेगा। ये अपनी माँ के बिना बिलकुल नहीं रहता।  पता नहीं आप लोगो ने क्या जादू कर दिया?

मैं उनसे कहना चाहती थी के जादू हमने नहीं बल्कि उनके इस नन्हे ने हमारे ऊपर किया था। पर कह नहीं पायी, क्यूंकि वो अनकही जुबान से मुझे एकटक देख रहा था । 

जैसे मेरे वचन कि मुझे याद दिल रहा हो।  मैंने आज तक उसका यह वचन निभाया है।  बहुत थोड़े लोगोसे मैंने ये बात शेअर कि है पर अब नहीं।  

अब मुझे मुक्त कर दो अपने वचन से सर्वेश !!!