यह १९८६ कि बात है। मैं तब अरुणाचल प्रदेश के ताफ्रागाम स्कूल में
थी। जब कन्याकुमारी में ट्रेनिंग चल रहा
था, तब अरुणाचल कि एक फ़िल्म हम बार बार देखते थे। उसे देखकर मेरा मन अरुणाचल कि ओर खिंचा जाता और
वाकई मेरे प्यारे अरुणाचल के ताफ्रागाम में ही मेरा पोस्टिंग हुआ। दो साल मजेसे
कटे और एक दिन विवेकानंद केंद्र के तबके जनरल सेक्रेटरी श्री बालकृष्णननजी स्कूल
में आये। रातको उन्होने बहुत सहजता से कहा,
'श्रद्धा, कल तुम्हे अलोंग के लिए
निकलना है।’
जैसे तैसे सामान भरा, सारे होस्टल् में
जाकर बच्चियोंसे मिली और अपने भावनाओंको समझनेसे पहले ही मैं स्कूल से निकल थी।
मेरी सबसे खास सहेली तुलसी, पूनम, प्रिय दीदियां अपर्णा और मंदा और मेरे हॉस्टल कि मेरी बेटियां प्रतिमा
मानताव, तिमिता, लोली, किमी, योयांग ऐसे कितने सारे नाम…. इन सबको छोड़कर जाना आसान नहीं था। शायद यह जानते हुआ श्री बालकृष्णनजी
ने मुझे समय नहीं दिया। किसी भी मनुष्य या चीज से लगाव कितना कठिन होता
है, है न ?
मुझे बस इतना याद है के मैं बेइंतेहा रोये जा रही
थी। वैसे भी मैं तब बहुत रोती, छोटी छोटी बात पर भी
आंसू बहाना आदत थी। मानो ब्रह्मपुत्र नदी आँखों में लिए घूमती थी। अब बड़ी मुश्किल से आंसू निकलते हैं।
मेरी सहेली तुलसी ने कहा, 'पंछी को आज़ाद छोड़ दो, अगर लौट आये तो वह
तुम्हारा अपना या तो फिर तुम्हारा कभी नहीं था।' लौटने कि बात दूर रही, मैं तो कभी ताफ्रागाम या अलोंग से निकली ही नहीं…… मैं कहीं भी रहूँ पर
अब तक मन वहीँ अरुणाचल कि आँचल में अटका पड़ा है।
अलोंग की यादें पहले उभर कर आ रही है क्यों कि
वहां शुरु में सिर्फ़ आ. रेखा दीदी और मै हि थे तकरिबन ६ महीनो तक। बादमें गीतादि आई और जब मै निकली तब शिप्रा
दीदी भी थी।
जब बच्चियां नयी नयी आयीं थी तब हम उनसे हिंदी
में बात करते, और जब वे हिंदी सिख जाति तब हम सिर्फ़ अन्ग्रेजी में बात करते ताके वे
इँग्लिश सिख जाये। मैं और रेखा दीदी उन्हें बहुत गाने सीखाते। तब उनको 'चन्दन है इस देश कि माटी , तपोभूमि हर ग्राम है। हर बाल देवी की प्रतिमा , बच्चा बच्चा राम है।' यह गीत सिखा रहे थे।
उस गीत में एक पंक्ति है - जहाँ खेत में
हल के नीचे, खेला करती सीता है। …
यह पंक्ति सीखते वख्त मैने उन्हें सीताजी के
पृथ्वी से जनम लेने की कथा भी सुनायीं थी। एक दिन जब मैं उनकी कक्षा में पढ़ा रही
थी तब अचानक जोरदार भूकम्प से स्कुल कि इमारत हिल उठी। भूकम्प से हम सभी डर गये और मैने उनको क्लास से
जल्दी जल्दी बाहर निकाला। बाद में जब सब शांत हुआ तब हम फिरसे क्लासरूम मैं चले
आये।
अरुणाचल में बच्चों को जितनी ज्यादा जानकारी दे
सकते उतना उस समय अच्छा रहता क्युँकी तब टेलीविज़न इतना आसानी से उपलब्ध नहीं था और
उपरसे लोड शेडिंग भी रहती थी। इसलिए मैं उन्हें मोहेन जोदड़ो और हरप्पा कि संस्कृति
के बारे में कहने लगी। देखा के लडकियां बिलकुल भी घबड़ाई नहि थी।
मैंने कहा,
देखो, भूकम्प होने से ऐसे बड़े बड़े साम्राज्य भी जमीं मैं गड जाते हैँ। अगर
आज भी जमीं फटती तो … ?मुझे लगा के सब डर जाएँगी और फिर मैं उन्हें कुछ समझाउंगी , पर.…
जवाब आया - "दीदी, अगर जमीन फट जायेगी
तो हम सीता को देखेँगे। " यह कहकर वें सब तालियां पीटने लगी।
मैं आजतक और अबतक उस घटना से और उस जवाब से बाहर
निकल नहीं पायी हूँ।
मुझे यह सब आपसे कहना और बांटना हि चाहिए। है ना ?
कैसे लगी मेरी मंतरी हुई यादों कि शीशी ?