Tuesday, 25 February 2014

सर्वेश कि कहानी का उत्तरार्ध: मैं तो चुप रहूंगी!


सर्वेश कि बात वहाँ नहीं खत्म हुई जहां व्यक्तिमत्व विकास शिविर समाप्त हुआ।  शिविर के पश्चात दो चार दिन के बाद मुझे उसकी बहुत याद आने लगी। वैसे भी हम शिविरार्थियों को मिलने जाते ही थे लेकिन इस बार मन जैसे उसको देखने के लिए व्याकुल था। मैंने प्रवीण से कहा चलो उसके घर जाते हैं। उसका घर पेरुगेट में था और वह 'वाडा' माने हवेली जैसे घर में रहता था। पुणे में जो टिपिकल पुराने घर थे उसका 'दिंडी' दरवाजा छोटा होता है और उसी दरवाजे से अंदर जाते समय सर्वेश ने साइकल से हाथ छोड़ दिए थे।

जब मैं और प्रवीण उसके पते पर पहुंचे तो देखा के जैसा उसने वर्णन किया था वैसा ही घर था।  दरवाजा बहुत ही छोटा था जिसे देखकर ही मेरी आँखें भर आयी। घर में सर्वेश के माँ बाबा और बहन थे। उन्होंने हमारी बड़ी आवभगत कि और उसकी माँ सर्वेश के बारे में कहने लगी।  सर्वेश तो चुपचाप और शांत बैठा था। सर्वेश कि बहन महाविद्यालय में पढती थी और दोनों भाई बहनो की उम्र में काफी अंतर था। सर्वेश घर में सबसे छोटा था इसिलिए ज्यादा लाड़ला था  पर माँ से उसे विशेष लगाव था। इसी वजह से सर्वेश माँ के बिना एक दिन भी दूर नहीं रह पाता।

हम चाय पी रहे थे और उसकी माँ सर्वेश के गुण बता रही थी और वो आँखें  नीचे किये सुन रहा था। इतने में उसकी माँ ने कहा, "ये सर्वेश बड़ा जिद्दी भी है। आपको पता है एक बार क्या हुआ? ये साइकल चला रहा था और न जाने कैसे गिर गया। इसका कान फट गया और काफी बड़ा जख्म हुआ। डॉक्टर को घर पर बुलाना पड़ा। उन्होंने कहा के लोकल अनेस्थेशिया देकर कान का जख्म सिलना पड़ेगा।  ये इतना जिद्दी है के इसने अनेस्थेशिया लेनेसे साफ़ मना कर दिया।  ना ये घबराया और कान सिलने तक मुँह से आवाज भी नहीं निकाली।

जब उसकी माँ उस किस्से को बयान कर रही थी, सर्वेश मुझे और प्रवीण को देख रहा था। मानो नजरों से मुझे अपना वचन याद दिला रहा हो। जैसे ही माँ कि बात ख़त्म हुई, सर्वेश ने फिरसे आँखें नीचे झुकायी। सारा किस्सा सुनते वख्त मैं अंदर से कांप रही थी, अपने आंसू रोकने कि कोशिश कर रही थी।  दिल कर रहा था उठके सर्वेश को गले लगाऊं पर अपने वचन से बंधी थी ना ! चेहरे पर आश्चर्य लिए ऐसे सुन रही थी मानो पहली बार सुन रही हूँ।

अब वो बड़ा हुआ होगा....मैं परसों पुणे में थी और जान बूझकर पेरुगेट इलाके में गयी।  सारा माहौल बदल चूका है, ना जाने वो सर्वेश का वाडा कहाँ गया। जुबान पर बार बार उसका असली नाम आ रहा है। तेरी कितनी भी याद आये सर्वेश, मैं तो चुप रहूंगी!

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