Thursday, 6 February 2014

शुक्रिया दोस्तों...

भिवंडी में जयपुर फूट का कैम्प था।  मेरे पी.आर.ओ ने मुझे कल्याण स्टेशन से आनेके लिए कहा।  मैं घरसे निकल पड़ी और बस से मुलुंड, वहाँ से ट्रेनसे कल्याण पोहोंची। एक पुलिसवाली से पुछा तो कहा, "बाहर से  या तो बस  मिलेगी या रिक्शा। बाहर आकर मैंने शे अ र रिक्शा पकड़ी और जैसे तैसे भिवंडी बस स्टेंड पोहोंची।  वहांसे दूसरी रिक्शा लेनी थी  मुझे एक पैर कटा हुआ आदमी  दिखाई दिया।  मैंने कहा, "चलो, पैर लगवानेके लिए ! चलो रिक्शा में बैठो !!" उस ने कहा, "हाँ मेडम, मैं अभी आयाआप रुको !"

मैं खुश थी के मुझे एक पेशंट मिल गया। उसका पैर घुटनेके उपरसे कटा हुआ था।  मैं उसकी राह देख रही थी इतने में वह खुद रिक्शा चलाता हुआ आया और कहा, "मेडम बैठिये। " उसके साथ  और एक १२-१३ साल का लड़का  सामने बैठा था।  मैं उससे बातें करने लगी मैंने पुछा, "तुम्हारा नाम क्या है?" जवाब आया, "मेहबूब चौधरी।"  इतने में उसने रिक्शा रोका और पूछा - "मेडम मैंने दारु पी है, तो फिर भी  आप पैर बिठाओगे क्या ?"  तुम्हारे दारु पिने का और पाँव बैठनेका क्या सम्बन्ध ? मैंने कहा। 

जैसे ही नजराना  कम्पाउंड, जहां कैम्प था, पोहोंचे तब वह उतरने के लिए राजी ही नहीं था।  "मेडम, मैंने दारु पी है, मैं अंदर नहीं आ सकता। " मैं जबरदस्ती उसे अंदर ले गयी और टेक्नीशियन से नाप लेने को कहा।  जैसे ही कुछ खाने के लिए दिया तो उसकि आँखें भर आयी।

मैंने उसे भाड़े से भी कई ज्यादा पैसे दिएबैसाखियां दी और दूसरे दिन आकर अपना पैर ले जाने को कहा। बहुत बोलने पर भी वह मेरे लिए रुका रहा और फिर अपने रिक्शे में ले ही गया।

भिवंडी बस स्टेंड पर मैंने उसे जाने को कहा ताके मैं दूसरी रिक्शा में कल्याण स्टेशन तक जा सकूँ।  उसने मेरी एक ना मानी और वह खुद उस छोटे  लड़के, तबरेज के साथ मुझे छोड़ने आया।  रास्ते में मेरे लिए ठन्डे पाने कि बोतल खरीदी और उसका बस चलता तो शायद मुझे अँधेरी तक भी छोड़ने चला आता।  "मेहबूब, मैं ठंडा पानी नहीं पी सकती, तुम यह सब मत करो। अच्छा, यह बताओ, यह लड़का कौन है?" तबरेज कि एक आँख नहीं थी और मेहबूब मुझे कबसे पूछ रहा था, "मेडम, क्या इसका इलाज कर सकते हो?"

तबरेज के दोनों गालों पर बहुत प्यारे गड्डे हो रहे थे,  बहुत ही प्यारा बचा था बस उसकी एक आँख नहीं थी।  पूछने पर पता चला के, उसकी माँ बचपन में ही गुजर गयी थी। पिता के एक पाँव में डाली हुयी सलाही की वजह से वह बिस्तर पर ही जकड़ा हुआ था।  तबरेज रिक्शा पोछता जिसमें उसे हर रिक्शेका पांच रुपया मिलता। रात को घर जाकर होटल से खाना लाकर, अपने पिता को खिलाकर फिर वह खाता।

सारी बातें सुनकर मैं चुप हो गयी।  ईश्वर किस किस प्रकार के दुःख देता है और ऐसे दो दुखी जीव मेरे साथ बैठे थे।  पर किसी भी तरह से वह दुखी नहीं दिख रहे थे। एक कि आँख नहीं थी और एक का पैर नहीं था पर दोनों के चेहरे पर एकही जैसी मधुर मुस्कान थी। जीने का हौसला था और जैसे भी हो काम करके अपने और अपने परिवार का ख्याल रखने कि उमंग थी जिसने मुझे आकर्षित किया। 

मेहबूब और तबरेज, आप दोनों तो यह पढ़ नहीं पाओगे पर चाहती हूँ के आप दोनों के जीने कि ताकद हर व्यक्ति में प्रवर्तित हों जो यह पढ़ें। मेरा जीवन समृद्ध करने के लिए शुक्रिया।                                

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