सर्वेश
कि कहानी:
सोचती
हूँ, ब्लॉग हिंदी में ही लिखा जाय ताके ज्यादा
लोगों के साथ मेरे अनोखे अनुभव बाँट सकूँ। यह तबकी बात है जब मैं पुणे विवेकानन्द
केंद्र में जीवनव्रती के तौर पर कार्य कर रही थी।
हर वर्ष वार्षिक परीक्षाओं के बाद हम छटवी से आठवी के बच्चों का 'व्यक्तिमत्व विकास शिविर' लिया करते थे। दो बार मैंने पांचवी के बच्चों को लिया और
जीवनभर के लिए हट के अनुभवों का संग्रह हुआ।
मुझे
अफ़सोस है के मैं उसका असली नाम नहीं लिख सकती।
जो मैं कहने जा रही हूँ वह उसका सभीसे छुपाया हुआ रहस्य था। पर इतना प्यारा रहस्य के अब मैं और ज्यादा समय इसे मेरे पास नहीं रख
सकती। अप्रैल १९९१ कि बात है । तब हम लोग हिंगने के कर्वे इंस्टिट्यूट
में शिविर लिया करते थे। शाम के ६ बजे तक सारे शिविरार्थी बच्चे आ चुके थे। पांच दिन के शिविर में साठ से ज्यादा बच्चों को
नहीं लेते। पहले दिन शाम सात बजे तक रिपोर्टिंग था और लगभग सारे बच्चे आ गए थे।
तक़रीबन
नौ बजे एक गोरा, प्यारा
लड़का मेरे पास आया। मैंने पहचाना यही वह
पांचवी क्लास का सबसे छोटा बच्चा था। कहने लगा, "ताई, मुझे घर जाना है, मुझे माँ कि याद आ रही है।" मैंने
उसके साथ एकदम बड़ों जैसे व्यव्हार शुरू किया।
"रजिस्ट्रेशन
फॉर्म भरते वक्त क्या तुमने नियम देखे थे? फिर तुम्हे पता होना चाहिए के अब पांच
दिन तक तुम घर नहीं जा सकते?"
वह
- हाँ, मैंने
सब पढ़ा
था पर अब नहीं रुक सकता, माँ कि याद आ रही है।
मैं
- अब बहुत देर हो गयी है, अब कुछ नहीं हो सकता। (मैंने सोचा वो कल तक भूल जायेगा) पर फिर भी वो
अडा रहा।
वह-
मुझे फ़ोन करना है।
मैं
- नियम के अनुसार तुम फोन नहीं कर सकते।
वह
- लेकिन मुझे जाना है।
मैं
- ठीक है, रिक्शा
में बैठो और जाओ।
वह
- बहुत रात हुई है, अकेला कैसे जाऊँ? तुम छोड़ने चलो।
मैं
- शिविर छोड़के मैं कहीं नहीं जा सकती। चाहो तो सुबह चले जाओ।
कुछ
सोचकर वह चला गया। दूसरे दिन सुबह प्रार्थना, योगासनके बाद नाश्ते के समय वो मेरे
पास आया। उस समय विवेकानंद केंद्र में हम पूर्णकालीन कार्यकर्ताओंको साड़ी पहनना अनिवार्य
था। बाकी
सारी लडकियां सलवार कुर्ती पहनती थी।
"क्या
मैं तुमसे कुछ पूछ सकता हूँ?"
"हाँ, पूछो!"
अगर
मैं घर गया तो माँ को बहुत बूरा लगेगा। जब
भी मुझे उसकी याद आये तो क्या मैं तुम्हारे पास आकर तुम्हे छू सकता हूँ? तुम मेरे माँ जैसी साडी पहनती हो।
मैंने
उसे अपने पास लिया और कहा, "हाँ, तुम बिलकुल मुझे छू सकते हो। जब भी माँ
कि याद आये तो मेरे पास चले आना।"
दो
तीन दिन वो दिन में चार पांच बार मेरे पास आता, मेरा पल्लू हात में लेता, कभी पास आकर लिपट जाता और मैं मन ही मन
एकदम खुश के अरे वाह, बच्चा शिविर में रुक गया।
तीसरे
दिन मैं प्रवीण पायगुडे और अन्य दो कार्यकर्ताओंके साथ बैठी थी, इतने में वो आया।
"मुझे
तुमसे कुछ कहना है।"
"कहो!"
औरोंकी
तरफ देखकर बोला, "तुमसे
अकेलिसे कुछ कहना है।"
"ये सब मेरे अपने है, इनके सामने तुम बोल सकते हो। वो किसीसे कुछ नहीं कहेंगे।"
उसने
सबकी ओर देखा और कहा, "मैं मेरी माँ से बहुत प्यार करता हूँ।"
मैंने
कहा, "मैं
भी मेरी माँ से बहुत प्यार करती हूँ। हम
सभी करते हैं। पर जबसे मैं विवेकानन्द
केंद्र में आयी तबसे मुझे माँ से दूर रहना पड़ता है। क्या करूँ, मुझे भी उनकी बहुत बहुत याद आती
है।"
“अच्छा
तो मुझे प्रोमिस करो के अब जो मैं कहूंगा वो तुम किसीसे नहीं कहोगी।"
मैंने
उसका छोटासा हाथ अपने हाथ में लेकर वचन दिया, "नहीं कहूँगी बाबा, किसीसे कुछ नहीं कहूँगी।"
वो
- "पर मैं आप सबसे ज्यादा प्यार करता हूँ मेरी माँ से।" उसने जोर देकर
कहा।
फिर
वो मेरे एकदम नजदीक आया और अपना दाहिना कान मुझे दिखाने लगा।
"ये चोट देख रही हो?"
मैंने
देखा उसका कान फटा है और जख्म का निशान भी है।
मैंने
कुछ पूछने के पहले ही वो बोलने लगा -
पता
है, एकबार
माँ सब्जी काट रही थी। और काटते काटते
उसका हाथ कट गया और खून बहने लगा। ये देखते ही मैं अपनी साइकल लेकर बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद अंदर आते आते दरवाजे
के बाहर ही दोनों हाथ छोड़ दिए। और फिर मैं
जोरसे अंदर गिर पड़ा और मेरा कान फट गया।
जब डॉक्टर आये तो मैंने उनसे कहा, "मुझे एनेस्थेसिआ मत दो, यूँही मेरा कान सी दो । पता है, कान का जख्म सीते वख्त मैं ज़रा भी नहीं
रोया, मैंने
उफ़ तक नहीं किया।"
मैं
अपनी माँ से इतना प्यार करता हूँ इसीलिए मैंने मुझे भी चोट पोहोंचायी।"
हम
सब सुन्न होकर चुपचाप उसकी बात सुन रहे थे। दंग रह गए थे।
मैंने
उसे गले लगाया और कहा,
"सचमें
सर्वेश, हम
में से कोई भी तुम्हारे जितना प्यार अपनी माँ से नहीं करता।"
शिविर
के पांचवे दिन वह घर जाने के लिए तैयार नहीं था। मेरे कमर से हाथ लपेटे रोये जा रहा
था। उसके माँ बाबा आश्चर्य से देख रहे थे और कहने लगे, " हमें तो लगा ये एक दिन में वापस आ जायेगा। ये
अपनी माँ के बिना बिलकुल नहीं रहता। पता
नहीं आप लोगो ने क्या जादू कर दिया?
मैं
उनसे कहना चाहती थी के जादू हमने नहीं बल्कि उनके इस नन्हे ने हमारे ऊपर किया था। पर कह नहीं पायी, क्यूंकि वो अनकही जुबान से मुझे एकटक
देख रहा था ।
जैसे मेरे वचन कि मुझे याद दिल रहा हो। मैंने आज तक उसका यह वचन निभाया है। बहुत थोड़े लोगोसे मैंने ये बात शेअर कि है पर अब नहीं।
अब मुझे मुक्त कर दो अपने वचन से सर्वेश !!!
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